***वो नहा रही थी***
संसार से छुपकर
दुषित कामुक नेत्रों से बचकर ।
अपनी मर्यादा की रक्षा करती हुई
वो नहा रही थी ॥
काली से काले केशों को सुल्झाती हुई
वो नहा रही थी ।
कमल नयनों को मूँद्ती हुई
वो नहा रही थी ।
मुख पर स्मीत लिये लज्जाती हुई
वो नहा रही थी ।
अधरों को फडफडाती हुई
वो नहा रही थी ।
शरीर को थरथराती हुई
वो नहा रही थी ।
नदी की लहरों सी मचलती हुई
वो नहा रही थी ।
निर्लज जल की बुँदे
उसका स्पर्श कर रही हैं ।
इससे बेखबर
वो नहा रही थी ॥
***तारा***
आज यकायक आकाश में नजर उठ गई
देखा कुछ कम्पीत सा, घबराया सा ।
मैने पूछा कौन है तू
अधरों को झिलमिलाते वो बोला ॥
सदा मैं तेरे सामने था
फिर भी तू यह पूछ्ता है ।
दुषित चन्द्र को तो तुने सदा चाहा है
पर मुझ पवित्र प्रकाश पुंज को सदैव से भूला है ॥
शायद एक कारण है
चन्द्र का चरित्र है अस्थायी ।
बढता है, घटता है
कभी कुलीन तो कभी शीतल होता है ॥
पर मैं, मैं तो सदा एकसा हूँ
भले हूँ योजन दूर, पर हर रात आता हूँ ।
मेरा प्रकाश शायद आजाये तेरे काम
यही सोच तत्पर हो आता हूँ ॥
पर शायद चन्द्र ही तुझसे मिलता है
पापी होकर भी तुम खुद को निश्कलंक कह्ते हो ।
पवित्र होकर तुम्हारा अस्तित्व ना हो जाये क्षीण
क्या यही सोच घबराते हो ॥
यही सोच शायद तुम मुझसे नजर नही मिलाते हो ।
***पहचान***
दू हाथ, दू पग का तेरा यो रूँड
जीपे तू करत है मान ।
समा, टका लगावत है ई पर
पर इको बचन तू जात है भूल ।
रूँड तो सबन का एको है
फिर कै है हमरी पहिचान ।
गोरब है ई रूँड का ई सर
जिसे तू खुद है खोयो ।
ना लाज. ना धरम
ना देस, ना ही तेरो मान ।
ना है ईका जस तेरे सर पे ।
और फिर तू पूछत है,
कियाँ है मेरी पहिचान ।
उँच कर अपना सर, उँच कर अपनी पहिचान
पहल खुद तो ऊठा, फिर औरन को पतित जान ।