हाल ही में बहुत व्यस्त रहा हूँ । शिक्षा के मामले होते ही कुछ ऐसे हैं । चलिये अब डींगे मारना छोडूँ और प्रारम्भ करूँ “अभिझान शाकुन्तलम” पर अपनी टिप्पणी ।
काव्येषु नाट्कं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला।
तत्रापि च चतुर्थोऽड्स्तत्र शलोक्चतुष्टयम् ॥
अर्थ तो आप समझ ही गये होंगे । नाट्कों में शाकुन्तल और उसमे भी चॊथा अंड्ग सबसे रम्य है ।
अभिझान शाकुन्तलम कालिदास कृत नाटक है । इसका मूल सोत्र तो महाभारत में राजा दुष्यन्त और शकुन्त्ला की कहानी है । लेकिन जहाँ महाभारत में ये कथा सिर्फ़ ५ श्लोकों में समाप्त है, वहाँ महाकवि कालिदास ने इस पर पूरा नाटक ही लिख डाला!!! यही नहीं महाभारत की कथा से यह तात्पर्य निकलता है कि राजा दुष्यन्त कामी और स्वार्थि तथा शकुन्त्ला चरित्रहीन नारी थी । अब व्यास को लोगों का चरित्र बिगाड्ने से क्या प्राप्त हुआ, यह तो महाभारत पढ्ने पर ही जागृत होगा, लेकिन कलिदास की काव्य कला तो देखिये कि कथा के नायकों का चरित्र चित्रण रमय ही नही, अनुकरणीय भी है । इसी लिये तो काव्य की भूरी-भूरी प्रशन्सा कोई विचित्र बात नहीं ।
कहानी तो शायद आप जानते होंगे । लेकिन मेरे वो बन्धुजन जो भारतीय सभ्यता को अपने हठ तथा मूर्ख्ता वश, इसका आये-दिन अपमान करते हैं उनके लिये कुछ उल्लेख करना आव्श्यक है । नही, मैं उनका अपमान नहीं कर रहा हूँ, सिर्फ़ अपनी ही पुरानी त्रूटीयों का अनुस्मरण हो गया…
चलिये शुरु करें । राजा दुष्यन्त एक मृग का पिछा करते महर्षि कण्व के आश्रम में पहुँच जाते हैं । तब महर्षि कण्व तिर्थ पर गये होते हैं, तथा आश्रम में अतिथि सेवा का काम शकुन्त्ला पर होता है । शकुन्त्ला महर्षि कण्व की पुत्री नहीं अपितु अप्सरा मेन्का की पुत्री है, जो पैदा होने पर अपने पिता महर्षि कौशिक द्वारा त्याग दी जाती है । राजा दुष्यन्त को महर्षि कण्व के शिष्य आश्रम आने का न्योता देते हैं, जिसे वे सहर्ष स्वीकार करते हैं । ळेकिन दुष्यन्त तो शकुन्त्ला का रूप देखकर उस पर मुग्ध हो जाते हैं । और शकुन्त्ला का भी यही हाल होता है । शकुन्त्ला की सखियाँ, प्रियम्वदा तथा अनसूया, ही दुष्यन्त और शकुन्त्ला में वार्तालाप करवाती हैं । नाटक के प्रथम अड्ग में इसी का वर्णन है । प्रथम अड्ग के अन्त में शकुन्त्ला दुष्यन्त को जाते हुए पिछे मुडकर देखती है, और यही चित्रकार राजा रवि वर्मा की प्रेरणा है । सचमुच बडा ही रोचक चित्र है । नाटक के छठे अड्ग में दुष्यन्त अपने द्वारा चित्रित शकुन्त्ला के चित्र का वर्णन करता है, और राजा रवि वर्मा का चित्र उस वर्णन से बहुत मिलता है, जैसे शायद दुष्यन्त का वही चित्र आज भी शकुन्त्ला के सॊन्दर्य का प्रतीक हो । सच में ह्रदय गदगद हो उठा ।
द्वितिय अड्ग में दुष्यन्त अपने शिविर में वापिस आता है, और अपने दिल का वृतान्त अप्ने मित्र विदूषक माद्व्य से कह्ता है । दोनों में तर्क होता है की एक आश्रम की युव्ती राजमहल में शोभीत होगी या नहीं । विदूषक तो राजा का कथन व्यंग समझता है, और सोचता है शायद राजन विनोद कर रहे हैं । लेकिन राजा तो कामदेव का शिकार बन चुका था, और अब उसे वन के सभी जन्तु प्रिय लगने लगे थे और शिकार हीन । जब राजा को राज्य से बुलावा आता है, तो वो माद्व्य को अपनी जगह भेज देता है, ताकी शकुन्त्ला के पास रह सके । लेकिन चलते समय वो माद्व्य को कह्ते हैं कि उनका शकुन्त्ला के बारे में कथन सिर्फ़ व्यंग था और वे उसे भूल जायें ।
तीसरे अड्ग में शकुन्त्ला का दुष्यन्त से वियोग का सजीव वृतान्त है । क्योंकी दुष्यन्त भी शकुन्त्ला को प्रथम द्रिष्टी में भा गये थे, इसी लिये वो काम-पीडा से अस्वस्थ हो गयी थी । प्रियम्वदा तथा अनसूया शकुन्त्ला के साथ नदी किनारे बैठ्कर शकुन्त्ला को दुष्यन्त के लिये प्रेम पत्र लिखने का अनुग्रह करती हैं । लेकिन काम व्याकुल दुष्यन्त तो पहले से ही उनकी बातें सुन रहा होता है । जब वह ये जानता है की शकुन्त्ला भी उस पर आरूड है तो वह शकुन्त्ला के सामने अपने दिल का हाल सुनाता है और शकुन्त्ला के संग गान्धर्व विवाह करने का प्रस्ताव रखता है । यद्यपि दोनो के विवाह और सम्भोग का वर्णन नाटक में नही है, तब भी कवि इस्का सन्केत चतुर्थ अड्ग के आरम्भ में ही कर देते हैं । इस्का एक कारण यह हो सकता है कि “नाटयशास्त्र” के अनुसार नाट्क में विवाह, युद्द, हिंसा आदि का उल्लेख शोभा नहीं देता । और आज कल के चलचित्रों को देखिये, इनके बिना तो जैसे इनका अस्तित्व ही मिट जाये!!! है ना व्यंग की बात…
चतुर्थ अड्ग “अभिझान शाकुन्तलम” का सबसे श्रेष्ट अड्ग मान जाता है । मेरी भी यही राय है, लेकिन अंतिम अड्ग में दुष्यन्त और भरत का मिलाप और भरत की बाल लीला भी कुछ कम मनोहारिनी नहीं । चतुर्थ अड्ग के आरम्भ में शकुन्त्ला और दुष्यन्त का विवाह हो चुका है और राजा दुष्यन्त शकुन्त्ला को अपने राजमहल में बुलाने का वादा कर चले जाते हैं, और याद के रूप में उसे दे जाते हैं अपनी अन्गूठी (मुद्रिका) । लेकिन उसी दिन अपने क्रोध के लिये प्रसिद्ध महर्षि दुर्वासा शकुन्त्ला को श्राप देते हैं की जिसे वो इतना प्रेम करती है की अतिथि-सत्कार भी उसकी याद में भूल गयी, वही उसे भूल जायेगा । दरसल दुष्यन्त की मुद्रिका को देखकर उसकी सोच में मगन शकुन्तला द्वार पर आये महर्षि दुर्वासा की तरफ़ पुकारने पर भी नहीं देखती । ळेकिन प्रियम्वदा एवंम अनसूया के अनुग्रह पर महर्षि दुर्वासा यह कहते हैं की राजा दुष्यन्त मुद्रिका देखकर उसे पह्चान जायेंगे । तब महर्षि कण्व तिर्थ से लौटते हैं, तथा सारा वृतान्त सुनकर शकुन्त्ला को आशिर्वाद देते हुये उसे अपने शिष्य शार्ड्गरव तथा शारद्वत एवंम माता गौतमी सहित दुष्यन्त के राज्य हस्तिनापुर के लिये विदा करते हैं । विदाई के समय का जो करुणामय द्रिष्य कालिदास ने प्रस्तुत किया है, शायद उसी लिये चतुर्थ अड्ग सब्से श्रेष्ट है । मेरा सर्वप्रिये प्रसंग वह है जिसमे शकुन्त्ला द्वारा पाला गया मृग जाती हुई शकुन्त्ला के वस्त्र खींच कर उसे जाने से रोकने का प्रयतन करता है । आन्खों से शकुन्त्ला गमन का वृतान्त पढ्कर आन्सुओं का स्वयं ही प्रवाह आरम्भ हो गया ।
पन्चम अड्ग में शकुन्त्ला, शार्ड्गरव, शारद्वत एवंम माता गौतमी के साथ दुष्यन्त के महल में उल्लास सहित प्रवेश करती है । लेकिन शाप वश राजा दुष्यन्त शकुन्त्ला को पह्चान नहीं पाते । तदोप्रान्त शार्ड्गरव और राजा में बहुत विवाद होता है । अंत में शकुन्त्ला मुद्रिका दिखाने का प्रस्ताव करती है, लेकिन रास्ते में गंगा में स्नान करते समय वह मुद्रिका उसकी अँगूलि से निकल गय़ी होती है । बस फिर तो राजा ने शकुन्त्ला का बहुत अपमान किया और उसे कुल्टा तथा चरित्रहीन भी कहा । यह सुनकर क्ण्व के शिष्यों को भी क्रोध आ गया और उन्हों ने राजा पर बालात्कार का आरोप लगा दिया । यूँ कहें कि बात मारा-मारी तक आ गयी । क्योंकि विवाहित शकुन्त्ला को आश्रम में रखना निति विरुद्ध होता, इसी लिये महर्षि कण्व के शिष्य शकुन्त्ला को उसके पति दुष्यन्त के पास छोडकर चले जाते हैं । लेकिन दुष्यन्त भी अज्ञान वश उस अभागन का तिरस्कार कर देते हैं । तब शोक व्याकुल शकुन्त्ला को आकाश से एक ज्योति उठा ले जाती है, जो कि असल में अप्सरा मेन्का होती है । सारे पान्च्वे अड्ग में दुष्यन्त को शकुन्त्ला का चरित्र और तेज देखकर यही शंका होती है कि कहीं ये सच तो नही कक रही, और जब वो शन्कुन्त्ला का आकाश में उड जाने की बात सुनता तो वह समझ जाता है कि उससे अक्ष्मिय भूल हो गयी है ।
छ्ठे अड्ग में नाटक में रोचक मोड आता है । राजा का शकार (कानून व्यवस्था का निरिक्षक) एक मछुआरे को राजा के सामने पेश करता है । असल में उसके पास वही मुद्रिका होती है, जो कि शकुन्त्ला के हाथ से गंगा में गिर गयी होती है । उसे वह मुद्रिका एक मछ्ली के पेट से मिलती है । बस फिर क्या था, राजा तो पश्अचाताप से व्याकुल हो उठता है । इधर मेन्का अपनी दासि सानुमति को दुष्यन्त के दरबार में छुप कर दुष्यन्त की विरह-अग्न का पता लगाने को कह्ती है । दुष्यन्त का शकुन्त्ला से विरह का वर्णन भी कुछ कम करुण नही । शकुन्त्ला के वियोग से पीडित दुष्यन्त वसन्त ऋतु में भी दुखी रह्ता है । अपने मित्र माद्व्य से वो अपने दिल का दुख कह्ता है और अपने द्वारा चित्रित शकुन्त्ला के सुन्दर चित्र की शोभा में ही खो जाता है । इधर माद्व्य तो चन्चल स्वभाव का होता है, वो सोचता है की राजा तो अपने साथ मुझे भी पागल बनायेगा !! ये सोचकर जैसे ही वो बच कर बाहर निकलता है, एक अघ्यात शक्ति उसे उलटा लटका देती है !! धूर्त के साथ अच्छा ही हुआ, क्यूँ? असल में वो शक्ति थे देव इन्द्र के सार्थी मातलि, जो कि दुष्यन्त को असुरों से युद्ध के लिये बुलाने आते हैं । दुष्यन्त और इन्द्र बडे ही घनिष्ट मित्र होते हैं । मातलि माद्व्य को इस लिये दबोचते हैं कि शकुन्त्ला विरह से व्याकुल दुष्यन्त क्रोधित होकर होश में आयें ताकि युद्ध में अपना कौशल दिखा सकें । छ्ठे अड्ग की समाप्ति पर दुष्यन्त मातलि के साथ देवलोक की तरफ़ प्रस्थान करते हैं ।
सातवें, और अन्तिम, अड्ग में जब दुष्यन्त मातलि के साथ असुरों पर विजय पाकर अपने राज्य वापिस आ रहे होते हैं, तब वे महर्षि मारीच के आश्रम से होकर जाते हैं (इन्हे महर्षि कश्यप भी कह्ते हैं, ये सभी महाऋशियों में श्रेष्ठ माने जाते हैं, और देवताओं और असुरों के पिता भी) । यहाँ पर एक बडी ही रोचक बात सामने आती है । दुष्यन्त मातलि के साथ इन्द्र के रथ पर आकाश से नीचे आ रहे होते हैं । आज कल तो हम लोग वायुयान से आकाश से ज़मीन की तरफ़ देख सकते हैं, लेकिन कवि कालिदस ने तो इस द्रिशय का कुछ एसा उत्क्रिष्ठ वर्णन किया है जैसे उन्हों ने खुद आकाश से धरती को देखा हो!!! जब ब्रह्माण्ड से बाद्लों के बीच इन्द्र का रथ आता है, तब दुष्यन्त कह्ते हैं,
अयमरविवरेभ्य्श्चातकैनिरष्पत्दिभ्र्हर्रिभिरचिर्भासां तेजसा चानुलिप्त:
गतमुपरि घनानां वारिगर्भोदराणां पिशुनयति रथस्ते शीकरकिलन्नेमि: ||
क्यों रोंगटे खडे हो गये ना !!! मतलब सुनेंगे तो वाह-वाह करने से खुद को रोक ना सकेगें । “जल कणों से भीगे हुए चक्र की धुरी वाला यह आपका रथ, अरॊं के छिद्रों से निकलते हुये चातक पक्षियों से तथा बिजलियों के तेज से अनुरन्जित घोडों से जल पूर्ण मेघों के उपर गमन को सूचित कर रहा है” । कुछ समझ आया?? भाव निकालना थोडा कठिन है, और पहले तो मैं भी भोंन्चक्का रह गया था । बाद्लों में तेजी से चलने के कारण रथ के पहियों पर पानी की बून्दें एकत्रित हो जाती हैं, जो खुद भी बिखरति हैं और बाद्लों में घूम रहे पक्षियों को भी इधर-उधर बिखेर रही हैं, और आप के रथ के घोडे बादलों की बिज्ली से डर रहे हैं । वाह, सुन कर एसा लगता है की शायद पुराने काल में वायु में भ्रमण कोई आम बात ही होगी!!! कवि कालिदस की श्रेष्ठा को शत-शत नमन ।
अरे नाटक को तो भूल ही गये !! दुष्यन्त महर्षि मारिच के आश्रम में घूमते हुए अपने पुत्र भरत की मनोहारिनी बाल लीला देखते हैं (भरत एक शावक को जो अपनी माँ का दूध पी रहा होता है, पूँछ से पकडकर दूर करता है ताकि वो शेरनी का दूध खुद पी सके!!!) । दुष्यन्त दुखी होता है कि अगर आज शकुन्त्ला उसके पास होती तो वो भी सन्तान सुख का आनन्द उठा सकता । तब धीरे-धीरे कवि कालिदास शकुन्त्ला का भरत की माता होने का अन्देश करते हैं, और फिर दुष्यन्त और शकुन्त्ला का भरत के सम्मुख मिलाप होता है । इधर दुष्यन्त अपनी भूल पर शकुन्त्ला से माफ़ी माँगते है, उधर शकुन्त्ला तो अपनी आँखों पर विशवास ही नही कर पाती , और दोनों के करुण वार्तालाप में बीच-बीच में भरत का शकुन्त्ला से पूछ्ना की ये कौन है, बडा ही मर्मम है ।
तब महर्षि मारिच दुष्यन्त और शकुन्त्ला को महर्षि दुर्वासा के शाप के बारे में बताते हैं, जिससे दोनों अपरिचित थे । यह सुनकर दुष्यन्त और शकुन्त्ला में एक दूसरे के प्रति क्षमा और भी बढ जाती है, और फिर दोनों भरत सहित अपने राज्य के लिये प्रस्थान करते हैं ।
तो ये था कालिदस कृत “अभिझान शाकुन्तलम” । कैसा लगा? मुझे तो बडा अच्छा लगा और आशा करता हूँ की आप के मन में भी इसकी छवी अन्कित हो गयी होगी । मैने तो “अभिझान शाकुन्तलम” पर एक गाना भी ढूँढ निकाला । इसे चढा रहा हूँ ( Upload, बन्धू!!)
अरे एक बात तो रह गयी, “अभिझान शाकुन्तलम” का मतलब क्या हुआ? “अभिझान” का अर्थ होता है “जिसके द्वारा पह्चाना जाये”, अर्थात जिसके द्वारा पह्चाना गया हो शकुन्त्ला को… और वो मुद्रिका ही तो इस नाटक का केन्द्र बिन्दु थी…दुष्यन्त नाम अन्कित वो मुद्रिका जिसने भारत को भरत दिया, और जिस भरत ने हमें भारत…

2 comments
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June 10, 2008 at 2:03 am
indianimg
You can view Raja Ravi Verma Painting here “http://indianimg.wordpress.com/files/2008/06/shakuntla.jpg”
Just google a bit and you will see a lot of pictures on Indian mythology by him. Alas…no Indian painter has time to revive Indian culture today…
My favorite painting of his is “The lady with lamp”…the shadow is extremely dominating.
Which is your favorite??
September 3, 2008 at 9:07 am
b s jadhav
Beautiful paraphrase of Shakuntalam… liked it very much