आज बहुत दिनों बाद कुछ लिख रहा हूँ । आप लोगों ने सम्झा होगा कि महाशय के भारतीय कला पर भर्सक लिख्ने के सारे कथन व्यंग थे । क्यूँ उचित कहा ना ? चलिये अब रुठना छोड दिजिये और मुझ को माफ़ किजिये । अछा चलिये आज एक पाली भाषा के प्रसिध नाटक “मॄच्छ्कटिकम्” के बारे में लिखता हूँ । क्या कहा ? नाम नहीं सुना इसका !! कोई बात नहीं, आज से एक महिने पहले तक मैं भी नहीं जानता था !! हाँ, लेकिन मैने प्रयास किया और अन्तत: आज मुझे इस महान रचना के बारे में आपको बताने का सॊभाग्य प्राप्त हुआ है ।
“मॄच्छ्कटिकम्” को राजा ‘शुद्राक्श‘ द्वारा रचित माना जाता है, लेकिन जैसे अन्ध्कार में कोई चीज़ है भी और नहीं भी, वैसे ही “मॄच्छ्कटिकम्” शुद्राक्श की रचना है भी और नहीं भी, अर्थात विश्वास्पूर्ण निश्चित नहीं है । लेकिन इस से तो साहित्य्कारों को फ़र्क पडता है, और इस बात का निश्चेय यदि विद्वान ही करें तो उचित है । हम और आप तो इतने में ही सन्तुष्ट हैं कि ये हमारी धरोहर है, हमारे भारत कि, हमारे महान साहित्य कि । क्यूँ ?
“मॄच्छ्कटिकम्” एक अच्छा नाट्क है, हास्य से तो भरपूर है, और गूढ विचारों कि भी कमी नहीं । बहुत सारे अप्शगुन जो आप और मैं मानते हैं, उनका भी वर्नण है !! नाटक के दो मुख्य पात्र हैं – चारुदत, एक ब्रह्मण जो कि अपनी उदारता के कारण अब गरीब है , और वसन्त्सेना जो कि एक वेश्या है, और चारुदत से प्रेम करती है । अब आप वेश्या के बारे में क्या विचार रख्ते हैं, एसा मैं नहीं जानता, लेकिन मेरा विचार ये है कि वेश्या रूप्वती स्त्री, जो कि बातचीत में निपुण, विदुषी और अपने योवन का गर्व करने वाली होती है, ना सिर्फ़ भोग-विलास में लीन कामिनी । और नि:सन्देह वसन्त्सेना, एक वेश्या, किन्तु एक चरित्रवान नारी है । चारुदत पहले से ही विवाहित है, पत्नि का नाम है धूता, जो कि एक आदर्श क्कुलस्त्री है, और पति के लिये सति होने में भी सन्कोच नहीं करती । वसन्त्सेना और धूता में कोइ द्वेष नहीं है, अथ्वा धूता वसन्त्सेना को अपनी छोटी बहन मानती है, और वसन्त्सेना स्वयं को धूता कि दासी । अब इस विश्य में मेरा गयान आप जितना ही है, लेकिन इस से में अन्दाज़ लगाता हूं कि प्राचिन समय में ये कोई साधरण बात ही होती होगी । नाटक का मुख्य प्रतिनायक (नहीं सम्झे, अरे बन्धु खलनायक) राजा का साला, शकार है – अत्यन्त दुष्ट, लोभी, स्वार्थि, मुर्ख, और भी कईं दुर्गुनों से युक्त । प्रतिनायक होने के साथ-साथ नाट्क का मुख्य हास्य्पात्र भी वो ही है । घम्ण्डी होने के कारण वो किसी कि नही सुनता, और इसी कारण वो हास्य के योग्य है । नाटक का दूसरा हास्य पात्र है चारुदत का मित्र मैत्रे, जिसे विदुषक कह्कर भी सम्भोदित किया है । तीसरा हास्य पात्र है, शार्वलिक नामक चोर, जो एक नियमों के अनुसार चोरी करने वाला चोर है!! कहानी में वह इस बात पर खूब विचार करता है कि घर में घुसने के लिये दिवार में किस आकार का छेद करना उचित रहेगा !! और जिस प्रकार मैत्रे नींद में उसे गेहनों का बक्सा दे देता है, वह तो बहुत हि मनोरन्जक है । क्यूँ आपके चेह्ररे पर भी मुस्कुराह्ट आ गयी ना । यही नहीं, चॊथा मनोरंजक पात्र है, एक जुआरी जो कि सन्यासी बन जाता है, लेकिन अपनी बुरी किस्मत के कारण मुसिबतों से नहीं बच सक्ता । एक द्रिशय में तो जैसे ही वह जुआ छोडकर सन्यासी बनता है, वैसे ही उसके उपर एक पागल हाथी हमला कर देता है, कहानी के सन्दर्भ में उस्की स्तिथि और भी रोचनीय है । इसके इलावा भी बहुत चट-पटी घट्नायें होती हैं । आखिर कुछ आप लोगों के लिये भी तो छोड्ना चाहिये ।
अब नाटक में क्या होता है, यह तो आपको पढ्ना है, हाँ कुछ उल्लेख ज़रूर कर देता हूँ । व्सनत्सेना चारुदुत्त से मिलने जाती है, किन्तु गाडी कि अद्ला-बद्ली होने के कारण पहँच जाती है, शकार के पास !! शकार के तो भाग खुल जाते हैं, क्योंकि वो वसन्त्सेना के साथ विलास करना चाह्ता है, और इसी लिये बहुत दिनों से उसे खोझ रहा था । और आज वह खुद उसके पास आ गयी !! वसन्त्सेना क्योंकि एक चरित्रवान नारी है, वह शकार की एक नहीं मानती । शकार क्रोध में आकर उसको मार देता है, लेकिन वो तो केवल मुर्छित होती है । किन्तु शकार तो मुर्ख है, वो तुरन्त न्याय-आलय पहँच जाता है, और चारुदत पर वसन्त्सेना को मारने का आरोप लगा देता है !! और परिस्तिथियाँ कुछ ऐसी होती हैं कि चारुदुत को मृत्यु-ढण्ड मिलता है (एक हास्य कि घट्ना और भी है… जब शकार वसन्त्सेना को मारकर भाग रहा होता है, उसे वही भिक्षु मिल जाता है, और उसको देख्कर वो जो कह्ता है, बहुत ही रोचक है)।
चारुदुत को जब मृत्यु-ढ्ण्ड के लिये ले जाया जाता है, तो चाण्डाल भी आपस में लड्ते हैं कि आज किसकी सिर काटने कि बारी है !! आखिर में, आखरी क्षण वसन्त्सेना आकर चारुदुत्त को बचा लेती है, और दूसरी तरफ़ राजा का वध हो जाता है, और राजा बन जाता है चारुदुत्त का मित्र (मैत्रे नहीं, कोई और…अछा नाम बता देता हूँ, आर्यक । इसकी भी बडी रोचक कहानी है) बस फिर क्या शकार पर तो क्यामत आ जाती है !! लेकिन चारुदुत्त उसे माफ़ कर देता है, और वसन्त्सेना एवम धूता के साथ सुकी जीवन व्यतीत करने चला जाता है ।
क्यूँ केसा लगा नाटक? निश्चय ही आजकल के व्यर्थ चल-चित्रों से तो बहुत ही रोचक तथा रसीक है । तो फिर अव्सर लगने पर क्या पढ्ने का वादा करते हैं? … अरे मुझे नहीं, राजा शुद्रक को !!

2 comments
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August 7, 2008 at 5:37 pm
Pankaj Mulchandani
Really liked ur blog. We were actually practicing for this play in college but could not perform because teh show got canceled. anyways, it refreshed my old memories. I have been looking for more play books to read but don’t find it here in bangalore. Do you know any pointers to online reading material of full text plays…
November 19, 2008 at 5:53 pm
Abhishek Mishra
aaj yun hi googlemein search karta hua is blog tak pahunch gaya. bahut hi utkrishtkarya kar rahe hain aapp. Sadhuwad. swagat apni virasat ko samarpit mere blog par bhi.