कालिदास कृत काव्य “कुमार सम्भवम” को गत सप्ताह मैने पढ़ा । इसमें शिव-पार्वती के विवाह और उसके फल स्वरूप कुमार कार्तिके के जनम एवम कार्तिके द्वारा असुर तारक के वध की कथा है। नि: सन्देह कालिदास ने इस कथा को पुरानों से लिया था, पर पुरानों कि इस निरस कहानी में इस प्रकार जीवन फुन्कना, कवि कालिदास ही कर सकते थे । मैने तो सिर्फ़ हिन्दी अनुवाद ही पढ़ा है, लेकिन हिन्दी में भी इस्की भूरी-भूरी प्रशन्सा करने से ना रह सका । और फिर अगर उच्च कोटी कि सन्स्कृत आती तो मजा तो अगमय होता । ळेकिन एक बात तो ज़र्रूर कहून्गा कि काव्य उच्च श्रेणी का है, पढ्ते समय आनन्द ही आता था, और बहुत छन्द तो दो-तीन पार पढ़ दाले ।

कुमार सम्भवम के १७ सर्ग (पाठ) हैं । मेरे सर्व प्रिये सर्ग तो, तृतीय सर्ग (कामदेव दहन); छटा सर्ग (पार्वति वाग्दान); अष्टम सर्ग (काम क्रिडा) और चतुर्दश सर्ग (देव सेना का प्रस्थान) हैं । पसन्द इस लिये नहीं कि काव्य का कोई रुचिगत भाग हों, पर इस लिये कि प्राकृतीक शोभा तथा नारी का जो वर्नण किया है, ऐसा लगता है जैसे कवि खुद वहां थे, जैसे खुद शिव-पार्वती ने ही इसको लिखा हो । काम क्रिडा वाला सर्ग पढ़ कर तो मन मचल उठा, और युध का वर्नण सुन्कर युदध में कूद पड्ने कि इच्छा हुई । सच्मुच अध्बुत रचना है ।

लेकिन, सोने में भी सन्सार कोई ना कोई कमी निकाल ही लेता है । कुछ कह्ते हैं कि अष्टम सर्ग के बाद का काव्य कालिदास ने नहीं लिखा है, परन्तु मुझे तो कुछ ऐसा प्रतीत नहीं हुआ । हाँ, आखरी नों सर्ग, कुछ लघु ज़रूर हैं, पर लघुता के आधार पर अप्नी बात की गान्ठ बान्ध लेना, मैं तो मुर्ख्ता ही कहूँगा । आप का क्या विचार है? युदध का वर्नण तो सच्मुच अनूठा है । सत्य जो भी हो, काव्य अभूत्पुर्व है । मैं तो यही अनुरोध करून्गा की इसे ज़रूर पढें । अन्ग्रेज़ी के बक्वास उपन्यास भी तो समय निकाल कर पढते हैं, तो फिर अपनी दरोहर का महाकाव्य पढ्ने में सन्कोच कैसा ।

मैं कर सकता हूँ, तो निस्चिन्त ही आप भी । आज कल सन्स्कृत में इसका मूल रूप ढून्ढ रहा हूँ, मिल्ने पर आपसे फिर दो बात्तें करून्गा । तब तक कुमार सम्भवम पड्ने का प्रयास किजिये, सरल है ।