आह!! विक्रम और बेताल की कहानियाँ । हम सब इन्हें कितने प्रेम से याद करते हैं । पर शायद हम ये नहीं जानते की आखिर ये कहानी शुरु कैसे हुई? क्या आप जानते हैं? ळो फिर चलो आज मैं बताता हूँ । अब ये सही है की नहीं, मैं नहीं जानता, पर कहानी सुनने में क्या हर्ज़ है ।

अब राजा विक्रम कौन थे, इसी पर विवाद है । भारत के इतिहास में बहुत से राजा विक्रम हैं (शायद १२), पर विक्रम और बेताल की कथाओं का विक्रम आखिर है कौन? कुछ कहते हैं की चन्द्रगुप्त मौर्य ही विक्रम हैं । पर उनका राज तो ई. ३७५-४१५ तक था, और उनसे पहले भी बहुत सम्राट विक्रम हुए। शायद ये  इस लिये की चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में वेताल भट्ट नामक नवरतन था । पर ये बेताल नहीं. और मैं ऎसा कैसे कह रहा हूँ?

शायद आप जानते नहीं, पर हमारी लोक कथाओं का मूल सोत्र राजा सातवाहन के मन्त्री “गुणादय” द्वारा रचित “बड कहा” नामक ग्रन्थ है जिसकी रचना ई. पूर्व ४९५ में हुई थी । यह सन्स्क्रीत से भी पुरानी प्राक्रीत भाषा में रचित कि गयी थी और इसमे ७ लाख छन्द थे । लेकिन अब इसे दुर्भाग्य ही कहें की आज उस महान रचना का कोई अस्तित्व ही नहीं है ।  ळेकिन सोमदेव ने इस्का पुनर्लेखन करने में भर्सक क्रम किया । यथास्वरूप आज भी हम “बड कहा” की अधिक्तम कहानीयों से परिचित हैं । वैसे सोमदेव की इस रचना को “कथा सरित सागर” कह्ते हैं, और ये “बड कहा” का ही अनुवाद है ।

“वेताल पन्च विन्शति” यानी बेताल पच्चीसी  “कथा सरित सागर” का ही भाग है । कहाँ “बड कहा” के ७ लाख छन्द थे और कहाँ  “कथा सरित सागर” में बचे सिर्फ़ २२००० । क्या था जिसे हम खो बैठै । खैर जो है उस्मे ही लुप्त रहना चाहीये । क्यूं क्या विचार है? समय बितने पर “कथा सरित सागर” का मुगल शाशक मुहम्मद शाह ने आम लोगों के लिये भी अनुवाद कराया ।

बेताल के द्वारा सुनाई गई कहानियाँ सिर्फ़ दिल बेहलाने के लिये नहीं हैं, इन्मे एक गूढ अर्थ है । क्या सही है और क्या गलत, इस्का अभिप्राय यदी हम सब जानने का प्रयास करें, तो शायद हम भी   राजा विक्रम कि तरह न्याय प्रिय बन सकेंगे, और छल छोडकर, द्वेश छोडकर, कर्म और धर्म की राह पर चल सकेंगे। और यह सम्भव है, क्योंकि राजा विक्रम की प्रजा में भी तो राजा विक्रम ही रह्ते हैं । ज़रूरत है तो सिर्फ़ दूँड्ने की । क्यूँ सही कहा ना?